इंद्रधनुष सपनों को!

आज फिर से मेरा एक पुराना गीत प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

इंद्रधनुष सपनों को, पथरीले अनुभव की
ताक पर धरें,
आओ हम तुम मिलकर, रोज़गार दफ्तर की
फाइलें भरें।

गर्मी में सड़कों का ताप बांट लें,
सर्दी में पेड़ों के साथ कांप लें,
बूंद-बूंद रिसकर आकाश से झरें।
रोज़गार दफ्तर की फाइलें भरें॥

ढांपती दिशाओं को, हीन ग्रंथियां,
फूटतीं ऋचाओं सी मंद सिसकियां।
खुद सुलगे पिंड हम, आग से डरें।
रोज़गार दफ्तर की
फाइलें भरें।


(यह गीत भी मेरे काव्य संकलन ‘आसमान धुनिए के छप्पर सा’ में सम्मिलित था।)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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4 responses to “इंद्रधनुष सपनों को!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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  2. यह सिर्फ एक कविता नहीं, बल्कि बहुत से युवाओं का कड़वा सच है। ‘गर्मी में सड़कों का ताप बांट लें’—इस पंक्ति ने जैसे संघर्ष के उन दिनों की याद दिला दी। शब्दों में जो कसक और ईमानदारी है, वो सीधे दिल में उतर जाती है। इस पुराने गीत को आज साझा करने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी, यह उन दिनों की कविता है जब मैं नियमित रोज़गार में नहीं लगा था।

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