आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री सोम ठाकुर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
सोम जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत –

सहनेवालों ने ही दुख दर्द सहे
मोटी ख़ालोंवाले तो दुर्दिन में
सुख में डूबे सुविधा के साथ रहे
आसान फूल का आँखों में गड़ना
कितना मुश्किल है मुश्किल में पड़ना
बहने वाले मझधारों के बीच बहे
जो बँधे रहे तट के त्याहारों से
वे समझदार कूलों के पास रहे
क्या अंतर जागों में, अनजागों में
अपनी ढफ्ली में, अपने रागों में
दहने वाले चिनगारी बने दहे
जो खोए थे वंशी की तानो में
वे बस्ती की लपटों से अलग रहे
आटा कितना गीला कंगाली में
मंत्रों वाले बैठे कव्वाली में
कहने वालों ने कड़वे सत्य कहे
अंधे मौसम कि नज़रों में चढ़कर
मिठ बोले सच्चाई से दूर रहे
अपनों ने अपनों में भेद किया
जिस पत्तल में खाया है, छेद किया
बस ‘जय हे जय हे जय जय जय जय हे!’
गाकर भी अपनी आम सभाओं में
पूरब वाले पश्चिम के साथ रहे
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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