आज फिर से मेरा एक पुराना गीत प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

हमने कब मौसम का वायलिन बजाया है।
हम सदा जिए झुककर, सामने हवाओं के,
उल्टे ऋतुचक्रों, आकाशी घटनाओं के,
अपना यह हीनभाव, साथ सदा आया है।
छंद जो मिला हमको, गाने को
घायल होंठों पर तैराने को,
शापित अस्तित्व और घुन खाए सपने ले,
मीन-मेख क्या करते-
गाना था, गाया है।
नत हैं हम अदने भी, शब्द हुए रचना में,
भीड़ हुए सड़कों पर, अंक हुए गणना में,
तस्वीरें, सुर्खियां सदा से ही-
ईश्वर है या उसकी माया है।
हमने कब मौसम का वायलिन बजाया है।
{यह गीत भी मेरे काव्य संग्रह (आसमान धुनिए के छप्पर सा) में सम्मिलित है।}
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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