आज फिर से मेरा एक पुराना गीत प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

मौसम के फूहड़ आचरणों पर व्यंग्य बाण,
साधे पूरे दम से, खुद को करके कमान,
छूछी प्रतिमाओं को दक्षिणा चढ़ानी थी,
यह हमसे कब हुआ।
कूटनीति के हमने, पहने ही नहीं वस्त्र,
बालक सी निष्ठा से लिख दिए विरोध-पत्र,
बैरी अंधियारे से कॉपी जंचवानी थी,
यह हमसे कब हुआ।
सुविधा की होड़ और विद्रोही मुद्राएं,
खुद से कतराने की रेशमी विवशताएं,
खुले हाथ-पांवों में बेड़ियां जतानी थीं,
यह हमसे कब हुआ।
(यह गीत भी मेरे काव्य संकलन ‘आसमान धुनिए के छप्पर सा’ में सम्मिलित है, जो एमेजॉन पर उपलब्ध है)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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