आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
इनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय उमाकांत मालवीय जी का यह नवगीत –

नाकाफ़ी लगती है हर ज़बान ।
कोई अक्षर
कोई शब्द किसी भाषा का
पूरा-पूरा कैसे व्यक्त करे
क्या कुछ कहता मन का बियाबान ?
एक रहा आने की, जाने की
घिसे-पिटे पंगु कुछ मुहावरे ।
दीमक की चाटी कुछ शक्लें हैं
बदहवास कुछ, कुछ-कुछ बावरे ।
कोई कितना ज़हर पिए कहो
नीला पड़ गया टँगा आसमान ।
बाबा आदम से गुम हुए सभी
तोड़ते ज़मीन कुछ तलाशते ।
रूढ़ हो गईं सारी मुद्राएँ
अर्थ जरा-जर्जर-से खाँसते ।
कितना यांत्रिक ! आदत-सा लगता
डूब रहा सूरज या हो विहान ।
चाहे जितना कह दो फिर भी तो
रह जाता है कितना अनकहा ।
कितनी औपचारिक हैं सिसकियाँ
कितना रस्मी लगता कहकहा ।
अगुआता घर-घर भुतहा भविष्य
और अप्रस्तुत लगता वर्तमान ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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