बे-वक़्त की घुटन!

ले आई छत पे क्यूँ मुझे बे-वक़्त की घुटन,
तेरी तो ख़ैर बाम पे आने की उम्र है|

अज़हर फ़राग़

2 responses to “बे-वक़्त की घुटन!”

  1. एक काव्यात्मक संवाद जो यह दर्शाता है कि हर स्थान और हर क्षण का अपना अर्थ होता है। कभी-कभी घुटन मात्र एक नए दृष्टिकोण और एक अलग तरह की साँस लेने की शुरुआत होती है।

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  2. हार्दिक धन्यवाद जी

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