चाँदनी की पाँच परतें!

आज एक बार फिर मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।

सर्वेश्वर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वर दयाल सक्सेना जी का यह नवगीत –


चाँदनी की पाँच परतें,
हर परत अज्ञात है ।

एक जल में,
एक थल में,
एक नीलाकाश में ।
एक आँखों में तुम्हारे झिलमिलाती,
एक मेरे बन रहे विश्वास में ।

क्या कहूँ , कैसे कहूँ…..
कितनी ज़रा सी बात है ।
चाँदनी की पाँच परतें,
हर परत अज्ञात है ।

एक जो मैं आज हूँ,
एक जो मैं हो न पाया,
एक जो मैं हो न पाऊँगा कभी भी,
एक जो होने नहीं दोगी मुझे तुम,
एक जिसकी है हमारे बीच यह अभिशप्त छाया ।

क्यों सहूँ, कब तक सहूँ….
कितना कठिन आघात है ।
चाँदनी की पाँच परतें,
हर परत अज्ञात है ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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4 responses to “चाँदनी की पाँच परतें!”

  1. यह एक गहन, आत्मीय और चिंतनशील कविता है जो हमें यह स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती है कि हर चीज़ को समझा या प्राप्त नहीं किया जा सकता।

    क्रिसमस की भावना हमें एकजुटता, सम्मान और स्नेह के महत्व की याद दिलाए, और ये मूल्य इन त्योहारों के बाद भी हमारे साथ रहें। सभी को शांति, हार्दिक आलिंगन और आशा।

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    1. जी, सही कहा आपने।

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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