आज फिर से मेरा एक पुराना गीत प्रस्तुत है, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

नींदों में जाग-जागकर, कर्ज़ सी चुका रहे उमर,
सड़कों पर भाग-भागकर, लड़ते हैं व्यक्तिगत समर।
छूटी जब हाथ से किताब, सारे संदर्भ खो गए,
सीमाएं बांध दी गईं, हम शंटिंग ट्रेन हो गए,
सूरज तो उगा ही नहीं, लाइन में लग गया शहर,
लड़ने को व्यक्तिगत समर।
व्यापारिक-साहित्यिक बोल, मिले-जुले कहवाघर में,
एक फुसफुसाहट धीमी, एक बहस ऊंचे स्वर में,
हाथों में थामकर गिलास, कानों से पी रहे ज़हर।
कर्ज़ सी चुका रहे उमर।
मीलों फैले उजाड़ में, हम पीली दूब से पले,
उतने ही दले गए हम, जितने भी काफिले चले,
बरसों के अंतराल से गूंजे कुछ अपने से स्वर,
क्रांति चेतना गई बिखर।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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