आज फिर से अपना एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा।

कहाँ की बात करते हो
कहाँ मेले लगे हैं अब
स्वजन तो अब नहीं दिखते
पराए ही सगे हैं अब।
खुशी के भव्य आयोजन
अमीरी के प्रदर्शन हैं
मगर अपनत्व का इनमें
नहीं दिखता कोई कण है।
करो व्यवहार सबसे तौलकर
क्या दिया, क्या पाया
अजी व्यवहार के ही तो
यहाँ नंबर मिलेंगे अब।
जगत में सत्य है पैसा
इतर जो भी है मिथ्या है
रहेगा जब तलक जीवन
यही अनमोल शिक्षा है।
चलन अब प्रेम का बाकी नहीं
व्यापार का है बस
सिखाता आ रहा कब से
मेरी ये सीख लेंगे कब।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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