प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

खेल ये बाज़ार का, कुछ दिन
बहुत अच्छा लगा!
खूब बिके हम, खूब खरीदा,
लोगों को, सामानों को,
गोदामों में जमा किया
सामानों को, परिधानों को
किंतु जब होने लगा ये सच,
हमें धक्का लगा।
मिथ्या है ये जगत
यही तो सुनते हम हैं आए
चालें ऊपर वाले की हैं
हम हैं बस चलते आए
किंतु पलटी जब हमारी चाल
तब झटका लगा।
खेल जमाया हमने अपना
केवल एक खिलाड़ी बन
माना यह है अलग और है,
अलग हमारा यह जीवन
किंतु हुआ जब घालमेल इसमें
न कुछ अच्छा लगा।
अजब-गज़ब है चमत्कार
अब के जीवन व्यवहार में
पता नहीं चलता कब हम
घर में हैं, कब बाज़ार में,
घर अचानक जब हुआ बाज़ार
तब गच्चा लगा।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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