प्रस्तुत है आज का गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-
हम हैं काव्यलोक के वासी
गीतों में रोते-हंसते हैं।
जब-जब मन व्याकुल होता है
हम उसकी लगाम कसते हैं।
जो पाषाण हृदय प्राणी हैं
उनकी अपनी आन-बान है,
सदा चाहते वंदित होना
उनसे ही चलता जहान है,
यह आधुनिक जगत है भाई
पग-पग पर विषधर डसते हैं।
पत्थर बनकर पूजित होंगे
मोम बने तो मिट जाएंगे
होना है अनुकूल समय के
तभी सुरक्षित रह पाएंगे,
जो मन से भोले प्राणी हैं
क्यों इस दुनिया में बसते हैं।
रहना है यदि आज सुरक्षित
पहचानो फिर चाल समय की
कभी, कहीं, कुछ भी हो जाए
कोई जगह नहीं विस्मय की,
नियम, कायदे, नैतिकता सब
सिर्फ किताबों में छपते हैं।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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