आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि कुमारेंद्र पारस नाथ सिंह जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
इनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है कुमारेंद्र पारस नाथ सिंह जी की यह कविता-

यहाँ से वहाँ तक दौड़ती रहती है।
कभी-कभी
जब बहुत घना हो जाता है अंधेरा,
लगता है,/ नहीं है–
पेड़-पौधे,/ पर्वत और झरने,
झीलें, नदियाँ–
ग़म में घुलते हुए कुनबे
और घोंसले / ख़ुशियों से कुलबुलाते–
सभी
नीली नींद में डूबे रहते हैं अपनी
मगर तब भी
पर्त-पर-पर्त पड़े अंधेरे की
छाती छेदती रहती है–
अपना पूरे वजूद लिए होती है रौशनी–
रौशनी अंधेरे का विलोम नहीं होती।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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