प्रस्तुत है आज का एक ग़ज़ल, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

झंझट सदा रहेंगे यार
ग़ज़लें तो लिख लें दो-चार।
सुख-दुख सारे सहकर हम
करते सपनों का व्यापार।
पुरस्कार तुम ले लेना
बात हमें कहने दो यार।
दिल के हम सरमायादार
पर लोगों का बहुत उधार।
बसे दूर कितने आकर
क्या देखें दिल्ली दरबार।
अरमानों से रहती है
ठोस हक़ीकत की तक़रार।
जहाँ नहीं अपनापन हो
आना-जाना है बेकार।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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