प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

मां की छवि जो हमने देखी
अब क्यों कहीं नहीं दिखती है।
वह निर्मलता, वह निश्छलता
वह भोलापन, वही सौम्यता
वह धरती के जैसा धीरज
आंखों से वात्सल्य छलकता,
वह पहचान बसी जो मन में
अब तो रही नहीं लगती है।
मां होने का मतलब क्या है
अब तो पता ही नहीं चलता,
यह निःसंग आत्मरत सी छवि
तर्कशीलता, स्वार्थ, कुटिलता
किसी भंवर में ममता की वह
लहर खो गई सी लगती है।
जो भी युग हो, बालक को तो
मां ही स्पर्श स्वर्ग का देगी
खुश होकर वह बालक के हित
सारे दुख जग के झेलेगी,
फिर क्यों हमको यह परंपरा
लुप्त हो गई सी लगती है।
मेरी मां तो नहीं रही पर
दिखती थीं कुछ गृहिणी मां सी
वह छवि क्यों आंखों से ओझल
हुई अचानक ज्यों ममता सी,
यह परिवर्तन सच में है या
मेरी आंखों की गलती है।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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