मन का सुगना!

प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

मन का सुगना
मुक्त, अनाहत
क्या फिर कभी लौट पाएगा।

गाता रहा बीच लोगों के
रहा छिपाता मन के छाले
कैसे मीत मिले जीवन में
पीड़ा के ही दाने डाले

ले अति सहज
सरल अपनापन
क्या उड़ान फिर भर पाएगा।


जो कुछ करते आए हैं वे
वह तो करते ही जाएंगे
जितना सहन करोगे प्रिय तुम
वे हिंसक होते जाएंगे,

भोला मन जो
लेकर निकले
बंधु, चने सा भुन जाएगा।

यह तो है बेढंगी दुनिया
तुम इसमें मन लेकर आए
लोग सुखी हों यही सोचकर
तुमने मधुरिम बोल सुनाए,

लेकिन वे ठहरे बहेलिए
उनको यह सब क्यों भाएगा।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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4 responses to “मन का सुगना!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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