प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

वर्तमान बन रहा अतीत,
ये है आज सुबह का गीत।
पूंजी हमें मिली सपनों की
हर रस्ते पर साथ चले हैं
हम जब गिरकर उठे राह में
सदा हाथ में हाथ गहे हैं,
झंडे और कनात नहीं हैं
अपनी पूंजी, अपने गीत।
एकाकी जीवन में हमने
डोर नहीं छोड़ी सपनों की
ये पूंजी ही कर सकती है
दूर कमी अपने, अपनों की,
स्वप्निल अरमानों की छाया
बन जाती है मधुरिम गीत।
लेकर अपने साथ चले हम
स्नेहिल हृदय, सजीले सपने
जो भी प्रेम भाव से आएं
वे सब ही लगते हैं अपने,
रिश्तों में अधिकार से नहीं
स्नेह मात्र से बनता गीत।
यह जीवन रण बहुत जटिल है
विपदाएं हैं, बाधाएं हैं
इस दुनिया में सभी लोग तो
करने प्रेम नहीं आए हैं,
प्रेमी जन यदि साथ रहें तब
जीवन में गूंजेंगे गीत।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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