अपना एक पुराना नवगीत अचानक याद आया, मैंने शायद इसे शेयर नहीं किया है-

हैं कहीं महाजन हम
कहीं हैं फक़ीर
मिटते संबंध ज्यों
धुएं की लकीर।
अड़ियल मेहमान
बना बैठा संत्रास
जेबों से निकल गए
कितने विश्वास,
शो-केसों में
ज़िंदगी जा सजी
पढते हम रह गए
हाथ की लकीर।
खुशियों के आयोजन
भार हो गए
जड़ता के बंधन
स्वीकार हो गए,
बुझे हुए सपने
ज्यों होली की राख
उड़ती तनख्वाह हुई
फाग का अबीर।
भूल गए सभी
स्वस्ति-वाचन के मंत्र,
सिंहासन पर काबिज़
हुआ अर्थतंत्र,
जीत गया दुःशासन
कूटनीति में
पगलाई द्रौपदी
उतार रही चीर।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
******
Leave a reply to samaysakshi Cancel reply