आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री सोम ठाकुर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
सोम जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री सोम ठाकुर जी का यह गीत-

हमने तो जन्म से पहाड़ जिए
और भी कठोर हुई ज़िंदगी
दृष्टि खंड -खंड टूटने लगी
कुहरे की भोर हुई ज़िंदगी
ठोस घुटन आसपास छा गई
कड़वाहट नज़रों तक आ गई
तेज़ाबी सिंधु में खटास की
झागिया हिलोर हुई ज़िंदगी
चीख -कराहों में डूबे नगर
ले आए अपराधों की लहर
दिन – पर- दिन मन ही मैले हुए
क्या नई -निकोर हुई ज़िंदगी
नाखूनों ने नंगे तन छुए
दाँत और ज़्यादा पैने हुए
पिछड़े हुए हैं खूनी भेड़िए
खुद आदम- खोर हुई ज़िंदगी
जो कहा समय ने सहना पड़ा
सूरज को जुगनू रहना पड़ा
गाली पर गाली देती गई
कैसी मुँहज़ोर हुई ज़िंदगी
सुकराती आग नहीं प्यास में
रह गया ‘निराला’ इतिहास में
चाँदी की संटी खाती गई
साहू का ढोर हुई ज़िंदगी
कानो में पिघलता सीसा भरा
क्या अन्धेपन का झरना झरा
मेघदूत-शाकुन्तल चुप हुए
यंत्रो का शोर हुई ज़िंदगी
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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