प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

हर कदम अभिव्यक्ति का
कब कारगर निकला,
चेतना के शून्य का
पत्थर नहीं पिघला।
तनिक कविता का मसौदा
जम नहीं पाया
एक भाव उधर गया
दूजा इधर आया,
और फिर जब साधने में
लगे थे कविवर
बीच से तब कसमसाकर
शब्द एक उछला।
वस्त्र जो हम चाहते हैं
पहन ले कविता
देखते हैं अधिकतर
उसको नहीं जंचता।
हठी बालक जिस तरह
बस करे मनचाहा
काव्य पर भी बस हमारा
जोर नहीं चला।
ढाल लेता रूप है वह
स्वयं के मन से
हम उसे स्वीकारते
अनमने चिंतन से,
चाहते हम ढालना
जिस रूप में उसको
काव्य ने अक्सर हमारे
रूप वह बदला।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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