आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
प्रभाकर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का यह नवगीत-

रातरानी रात में
दिन में खिले सूरजमुखी
किन्तु फिर भी आज कल
हम भी दुखी
तुम भी दुखी !
हम लिए बरसात
निकले इन्द्रधनु की खोज में
और तुम
मधुमास में भी हो गहन संकोच में ।
और चारों ओर
उड़ती है समय की बेरुख़ी !
सिर्फ़ आँखों से छुआ
बूढ़ी नदी रोने लगी
शर्म से जलती सदी
अपना ‘वरन’ खोने लगी ।
ऊब कर खुद मर गए
जो थे कमल सबसे सुखी ।
हम भी दुखी
तुम भी दुखी ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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