सूरज पर अभियोग!

प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

वादीगण जब सूरज पर
अभियोग लगाएंगे,
साक्षी बनकर आंख मूंद
कितने जन आएंगे।

कितनों से दुश्मनी सदा यह
लेता रहता है,
बिन मांगे हर जगह रोशनी
देता रहता है।
यह पहले ले जान कहाँ
रोशनी अवांछित है
कितने सारे कृत्य इसी से
होते बाधित हैं।

मौका पाकर सब अपने
मसले सुलझाएंगे
पूरे मन से जी भर
सूरज को गरियाएंगे।

एक समानांतर दुनिया
इस दुनिया के अंदर है,
मूल्यों का कर त्याग
वहाँ सब बने सिकंदर हैं
उनके कृत्यों पर प्रकाश
यदि कोई डालेगा
तब निश्चय ही उनको
अपना शत्रु बना लेगा,

न्याय तंत्र में ऐसे जन
तब आश्रय पाएंगे,
अनधिकार प्रवेश का मुद्दा
खूब उठाएंगे।

यह विश्वास समय ने सबको
आज परोसा है,
दुर्जन को तो न्याय तंत्र पर
अधिक भरोसा है,
बहुत ज़रूरी चाल समय की
सूरज भी जाने
तर्क-कुतर्क प्रभावी जो हैं
उनको पहचाने,


वरना सूरज भाई सुन लो
यही प्रभावी लोग
काला मुंह करके
जनता के बीच घुमाएंगे।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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4 responses to “सूरज पर अभियोग!”

  1. आपकी कविता सामाजिक पाखंड और भ्रष्टाचार की एक विनोदी और गहन आलोचना प्रस्तुत करती है। यह सूर्य को सत्य और न्याय के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करती है, और दर्शाती है कि कितने लोग सूर्य पर इसलिए हमला करते हैं क्योंकि वह उन चीज़ों को प्रकाशित करता है जिन्हें दूसरे छिपाना पसंद करते हैं। यह सत्ता के नाम पर मूल्यों के ह्रास और छल-कपट का प्रतिबिंब है।

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    1. इस सहृदय सराहना के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद जी।

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  2. नमस्कार 🙏🏻 प्रशंसनीय

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    1. नमस्कार जी, धन्यवाद।

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