प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

गीत अपाहिज
मन में भटके
कहीं नहीं पहुंचे दुनिया में!
रहे छिपाए दर्द हमेशा
कभी न लोगों तक पहुंचाया
और दर्द देने वालों ने
जी भरकर उत्पात मचाया,
अब ये दर्द
सजाएंगे हम
लोगों के समक्ष बगिया में,
दर्द बांटने वाले जानें
अब न ये कारोबार चलेगा,
उनके कृत्य उजागर होंगे
गूंगा कोई चुप न रहेगा,
सब बातें
कहनी-अनकहनी
भेंट करेंगे अब डलिया में।
अब न अकेले में रोएंगे
शायद तुम्हे रुला देंगे अब
डर के हों या भावुकता के
बंधन तनिक न मानेंगे अब
बात खुलेगी धीरे-धीरे
जो थी गहरे दबी हिया में।
सदियों से होता आया है
भावुक जन पीड़ा सहते हैं
और उधर निर्दयी बहुत से
जो चाहे करते रहते हैं
बहुत हो चुका अब न चलेगा
यह निर्मम व्यवहार क्रिया में।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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