सुधारेंगे दुनिया को!

प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-


सुलझा नहीं सके जब
अपने घर के मसले,
हमने सोचा चलो
सुधारेंगे दुनिया को!

दुनिया का वह ट्रंप
बहुत ही शातिर होगा
लेकिन उससे तो
अपनी पहचान नहीं है।
हाँ पर अपने पास
विचार बहुत सारे हैं,
उनको यहाँ बरत लेना
आसान नहीं है,


बनें दूत हम विश्व-शांति के
धाक जमाएं,
एक नया ही दर्शन
दे डालें दुनिया को।


कहीं दूर भेजे जा सकते
प्रस्ताव सुलह के
वार्ताओं के, समझौते
विचार-विनिमय के,
लेकिन अपने यहाँ
कौन सुनता है हमको
घर के जोगी हम ठहरे
सूखे से तिनके,


सच्चे भाव हमारे
कविता में दिखलाएं,
बात हमारी भा जाए
शायद दुनिया को।


ढोल दूर के तो
सुहावने ही होते हैं,
शांति विषय पर हम भी
कविता लिख सकते हैं,
अपना नहीं ओज से
दूर-दूर तक नाता
कविता में भी वीर कहाँ से
दिख सकते हैं,


जैसा भी हो, भाव शांति का
अपना सच्चा,
दोहराएं हम, यह ही
भिजवाएं दुनिया को।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
******

4 responses to “सुधारेंगे दुनिया को!”

  1. सुन्दर रचना।

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    1. Hardin dhanyavad ji

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  2. नमस्कार 🙏🏻 सुंदर प्रस्तुति 👌

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    1. धन्यवाद जी, नमस्कार

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