इन अंधेरी घाटियों के!

आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

इन अंधेरी घाटियों के पार जाना है
वक़्त तो इसमें लगेगा ।

आज की दुनिया बहुत
खूंख्वार लगती है,
आदमीयत पर खिंची
तलवार लगती है,

इस व्यवस्था का कोई उपचार लाना है
प्रेम क्या संभव करेगा।

मानते जो स्वयं को
सिरमौर दुनिया का,
पालने में पालते
आतंक के आका,

होश में उनको मगर इस बार लाना है
खौफ जब दिल में जगेगा।

देखना जिनको धरा पर
सुखी हो जीवन
कर रहे हैं वे मगर बस
शक्ति-संयोजन

दृष्टि में उनकी तनिक विस्तार लाना है
कौन आखिर यह करेगा।

हम सदा से चाहते
कल्याण दुनिया का
शस्त्र का व्यापार केवल
ध्येय पर उनका

विश्व है परिवार यह उनको बताना है
क्या कभी यह हो सकेगा।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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2 responses to “इन अंधेरी घाटियों के!”

  1. एक गहन और चिंतनशील कविता। यह दुनिया के अंधकार और प्रेम व जागरूकता के माध्यम से मानवता को पुनः प्राप्त करने की आवश्यकता के बारे में साहसपूर्वक बात करती है। बहुत प्रेरणादायक।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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