प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

क्यों जागा करते हो कविवर
खोज रहे हो क्या रातों में!
केवल छत को देख सकोगे
लेट पलंग पर कमरे में तुम
बहुमंज़िला इमारत है यह
इधर हुआ है चंदा भी गुम,
छिटपुट तारे देख उन्हें
क्या उलझाओगे बातों में।
ये दुनिया का मेला भ्रम है
किसे यहाँ संतोष मिलेगा,
भाग्यवान वह जिसका कोई
साया बनकर साथ चलेगा,
ज़िंदा रहना है जीवन की
सारी घातों-अपघातों में।
जगने को पूरा दिन होता
जितना चाहो तब तुम सोचो
करो व्यवस्थित खुद को प्रियवर
सोचों के पर तो मत नोचो
अधिक सोचकर क्या कर लोगे
इन बैरिन निर्मम रातों में।
है यह कुटिल समय इसमें तुम
खोज रहे हो संगी-साथी,
सबका अपना-अपना जीवन
सब हैं सुविधा के बाराती,
यहाँ भीड़ में लोग अकेले
दिवसों में भी और रातों में।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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