आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

पढ़ने वाला भले न कोई
प्रेरित हुए भवानी जी से
लिखते रहते हम दिन-रात।
पढ़कर सम्मति दे यदि कोई
क्या तब अर्थ बदल जाएंगे
व्यस्त सभी अपने कर्मों में
हमको पढ़ने क्यों आएंगे,
ये दुनिया तो है अपनी भी
कविता में कह लेंगे हम भी
निज सुख-दुख, जज़्बात।
सब अपने प्रचार मंत्री हैं
अपनी ही कविता पढ़ते हैं
फिर अपनी ही खातिर मन में
खूब विशेषण भी गढ़ते हैं,
हम भी खुद को करें प्रदर्शित
कोई भले न देखे हमको
खुद से कर लें बात।
अपने गुरुजन थे तुलसी भी
लिखा सदा अपने सुख खातिर
विद्वानों ने मानस को भी
झुठलाया इतने थे शातिर,
समय कसौटी सबसे ऊंची
परखेगा सबकी रचना को
अभी भले हों जो हालात।
प्रस्तुति, शिल्प ज़रूरी हैं पर
सबसे ऊपर स्थान कथ्य का,
कवि की निष्ठा और सरलता
करते जो संधान सत्य का,
बात कहें लोगों की उनसे
जिसमें वे खुद को पहचानें
समझें तुम हो साथ।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a comment