दूर हम खुद से चले आए!

प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

बने यायावर फिरे, कुछ गीत भी गाए
किंतु कितनी दूर हम खुद से चले आए।

था समय जब दोस्तों की महफिलें भी थीं
काफिले भी थे, नज़र में मंज़िलें भी थीं,
अब कहाँ ठहराव में आकर रुके हैं हम
खो गई जीवंतता पहचान जीवन की,

भाव जो मन में उमगते कभी पल भर को
दुबक जाते हैं वहीं फिर सहम, घबराए।

वह समय जब लक्ष्य थे, हासिल बहुत कम था
था मगर एक हौसला, विश्वास था, दम था,
अब कहाँ वह चाव, वह उल्लास वह एहसास
खो गया जो भी सृजन का सहज उपक्रम था,

पहुंच पाए हैं जहाँ, पहुंचे हुए हैं हम
हैं सुरक्षित हम मगर संतोष कब पाए।

आदतन अब चल रहे हैं, बिन उमंगों के
बुझ गई वह स्नेह में भीगी हुई बाती
भाव चेहरे पर लिए हैं हम दबंगों के
छोड़कर हमको गई है प्रीत इतराती

देखते बैठे मुंडेरों पर लिए उम्मीद
प्रेम का पंछी कदाचित लौटकर आए।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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2 responses to “दूर हम खुद से चले आए!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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