प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

रोशनी से धुल गई सारी सियाही
अमावस की इस अंधेरी रात की।
चांद बेशक है नहीं, पर छा रहा
उल्लसित पावन उजाला, हर तरफ
है हमारी आस्था का प्रतिफलन
चांदनी का सिलसिला चारों तरफ
अमर स्मृतियां हैं हमारे साथ में
सत्य की जय की, असत की मात की।
रात घिरती ही रही हर काल में
धौंस दिखलाती सुजन को, शिष्ट को
क्योंकि असुरों का समर्थन है सदा
मानवों के शत्रु घोर अशिष्ट को,
इस निशा को चीरकर लानी हमें
किरण एक नए सुनहले प्रात की।
युद्ध यह चलता रहा है हर समय
संजो लेते हैं निशाचर शक्तियां,
दबाते जो सुजन और सुशील की
निष्कपट, ममता भरी अभिव्यक्तियां
एकजुट होना ज़रूरी है हमें
कर सकें रक्षा मनुज की जात की।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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