गुल हैं मगर सताए!

अपना मक़ाम शाख़-ए-बुरीदा* है बाग़ में,
गुल हैं मगर सताए हुए बाग़बाँ के हैं|

*कटी हुई शाख़

चकबस्त बृज नारायण

2 responses to “गुल हैं मगर सताए!”

Leave a reply to satyam rastogi Cancel reply