आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि और मेरे अग्रज कुबेर दत्त जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।
कुबेर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है कुबेर दत्त जी की यह कविता –

कभी-कभी सोचता हूँ
बहुत हो गई
बहुत हो गई कविताई ।
जीवन के नाम पर शेष
चेक एक पग़ार का
कविता उसमें कुछ कर पाई ?
कभी-कभी सोचता हूँ
बहुत हो गई कविताई ।
जीवन के नाम पर
उजड़ता रचना-प्रदेश
उसमें भी यहाँ-वहाँ साँप, बिच्छू, अजदहे
कहीं कंटाल
कहीं खंदक, कहीं खाई
कभी-कभी सोचता हूँ
बहुत हो गई कविताई ।
जीवन के नाम पर बच रहे ढकोसले
पकोड़े, चाय, विमोचन, नोचन
चाय, चूँ-चूँ, चरड़-चरड़
कुछ भाषाई झाड़-फूँक
कुछ शाब्दिक शबाब
कुछ मरियल-मरियल शब्द-क्रीड़ा
सुनने की इच्छा अन्ततः
बूढ़ा शाब्दिक रबाब
शब्द न हुए शब्द ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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