प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

कितने पिछड़े हो तुम प्रिय
अब भी दिल की बातें करते हो,
यह सारा जग है विनिमय का
केवल बुद्धि यहाँ चलती है,
यहाँ सभी को दिलवालों की
बुद्धिहीनता ही खलती है,
किस दुनिया में रहते हो तुम
किस जग में विचरण करते हो।
मंडी लगी यहाँ उन्नति की
बौद्धिक जन का लगता मेला,
जो दिल की बातें करता है
खड़ा हुआ वह निपट अकेला,
आखिर अपने स्नेह दीप तुम
कौन सी दिशा में धरते हो।
दिल है वस्तु पुराने युग की
कहाँ साथ तुम ले आए हो,
अधिक भार का शुल्क लगेगा
यह भी समझ नहीं पाए हो,
जांच कर कोई कह सकता है
तुम कुछ गलत काम करते हो।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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