आज प्रस्तुत है एक नवगीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

बादल अब जाने वाले हैं।
फिर आएंगे कभी अतिथि बन
अभी बने बैठे हैं मालिक,
सभी कार्य-व्यवहार चल रहा
अभी इन्हीं के मूड मुताबिक,
नहीं दबंग रहेंगे अब ये
निर्बल हो जाने वाले हैं।
कुछ दिन बाद लोग बोलेंगे
सर्दी आई, सर्दी आई
हम तो रहते हैं गोवा में
भूल चुके हैं सूट-रजाई,
जो भी हो आने वाले दिन
ठंडक तो लाने वाले हैं।
हम हैं महादेश के वासी
गर्मी कहीं, कहीं है सर्दी
मौसम ही ले जाता शिमला
और कभी दक्षिण बेदर्दी,
छोड़ो ये सब, बंधु अभी तो
ये बाहर जाने वाले हैं।
चलने की तैयारी में
खाली करते बाल्टी-भगौने
लेकिन अक्सर छितरा जाते
कुछ इनके अति चंचल छौने,
लंबा सफर, बड़ा कुनबा है
कष्ट बहुत आने वाले हैं।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार ।
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