अक्सर हमें आत्महत्याओं के समाचार मिलते रहते हैं, हाल ही में एक उच्च पुलिस अधिकारी द्वारा आत्महत्या का समाचार मिला था, उसी की प्रतिक्रिया स्वरूप एक गीत प्रस्तुत है।
प्रस्तुत है आज का यह गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

कितना सहा दर्द जीवन में
साफ-साफ लिख गया!
क्या मानें हम इस लेखन को
कविता, गीत, कहानी है क्या,
जो पीड़ा अभिव्यक्त हुई वह
लोगों से अनजानी है क्या
अब जो ज़ाहिर हुआ अभी तक
क्यों अविदित रह गया!
हाँ ऐसे हैं लोग यहाँ जो
जीवन भर सहते जाते हैं
ऐसे भी है अन्य बहुत जो
बिना सहे कहते जाते हैं,
चुप रहकर कोई निरीह जन
कितना कुछ सह गया।
अब जो खलनायक उभरेंगे
आदरणीय रहे कल तक वे,
सहने वालों के बल पर ही
मनमानी हैं खूब किए वे,
उनको दंड दिलाएं ऐसा
फिर न कांड हो नया।
धनी-दरिद्र अलग श्रेणी हैं
एक विभाजन इनका भी है
वह जो सहते चुप रहकर औ,
जिन्हें सहन न तिनका भी है,
हर प्राणी के पास कहाँ हैं
चिंतन, करुणा, दया।
अक्सर यहाँ लोग अपना ही
दर्द निरंतर गाते रहते
संकट वे ही पाते हैं जो
बिना शिकायत सब कुछ सहते,
पीड़ा को मापे ऐसा हो
बैरोमीटर नया।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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