आज प्रस्तुत है एक ग़ज़ल, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

ना ये टूटे, ना ये हारे
भाव हमारे, दुर्ग तुम्हारे।
जब भी ऊंचे सपने देखे
भटके हैं हम मारे-मारे।
बांधे से ये कब बंधते हैं
भाव उदधि, नदिया के धारे।
आखिर शांत बैठना होगा,
कितना तुम उड़ते हो प्यारे
स्लेट पर लिखावट जैसे हैं
क्षणभंगुर संकल्प हमारे।
बैठो कुछ पल तो सुस्ता लो
क्यों फिरते हो द्वारे-द्वारे।
कब सुखकर संदेशा लाए
अपनी आशा के हरकारे।
कभी कभी अच्छे लगते हैं
धमकाते ये बदरा कारे।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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