आज प्रस्तुत है एक नवगीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

बात करेंगे हम तो मन की
गीत कहो, नवगीत कहो तुम,
या प्रलाप की रीत कहो तुम,
हम को कहते ही रहना है,
धारा सा अविरल बहना है।
हम मन की गिरहें खोलेंगे
धूप दिखाएंगे जीवन की।
मन ही है, संपत्ति हमारी
सहता सभी विपत्ति हमारी,
इसे सदा ले साथ चले हैं
सहमे कभी, कभी उछले हैं,
इसने वातावरण बनाया
कमी न खल पाई है धन की।
मन से जीते, मन से हारे
झूठे बाकी सभी सहारे,
इच्छाशक्ति इसी में पनपी
जिसके आगे पर्वत हारे,
ये ही है सुंदर फुलवारी
संकल्पों के निज उपवन की।
केवल मन ले साथ चले हैं
अवरोधों के शिखर गले हैं,
समय बदलता रहा हमेशा
साथ-साथ हम भी बदले हैं,
प्रेम भरा व्यवहार रहे बस
हमको चाह नहीं कंचन की।
मंदिर, मस्ज़िद, मगहर, काशी
प्रभु तो हैं घट-घट के वासी,
मन यदि सच्चा, सब कुछ अच्छा
आस घनेरी, प्यास जरा सी
चलते रहें निरंतर बस हम
यही साधना है जीवन की।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार ।
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