आज प्रस्तुत है एक कविता, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

कब उसके यौवन की
धूप ढली
इतना भी नहीं जाने
रामकली।
सुबह सवेरे ही
उठ जाती है
झाडू-पोंछा खूब
लगाती है
जब तब खाती डांट
खूब पगली।
धरम-करम को
खूब मानती है
सारे तिथि-त्योहार
जानती है,
जो भी करते,
करते
राम भली।
मुद्दत से वो
सेवक है घर की
सुख की दुआ
मांगती है
सबकी
यही आस्था है
उसकी
असली।
मालिक उसके,
छोटे-बड़े सभी
गुड्डू, छुटकी
भैया और भाभी
अर्पित साध सभी
अगली
पिछली।
जैसे-तैसे
भोजन पाती है,
प्रभु की कृपा
उसे बतलाती है,
भोजन के संग
गुड़ की एक
डली।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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