आज प्रस्तुत है एक गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

मन है भारी आज सुबह से
ये दुश्वारी आज सुबह से।
कितने जतन किए बचने के
घोड़ों की लगाम कसने के,
जितना रोके, उतना भागे
मन के अश्व नहीं रुकने के,
विचलन मन के हो जाते हैं
यहाँ कभी भी किसी वजह से।
भागे वहाँ, जिधर कुछ पाए
निर्मोही हम कब बन पाए
कुछ लोगों की तरह संतुलित
अपने कदम नहीं हो पाए,
लुटा दिया दिन की पूंजी को
अनायास ही आज सुबह से।
बहलाने के कितने साधन
रहे गणित में हम तो निर्धन
चमक दिखाकर हमें थमा दो
हो वह पीतल या हो कंचन,
हमको है अमूल्य वह सब कुछ
जो सौंपा जाए आग्रह से।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
******
Leave a reply to Nageshwar singh Cancel reply