ज़िंदगी अब कहीं नहीं है!

तुम अपने क़स्बों में जा के देखो वहाँ भी अब शहर ही बसे हैं,
कि ढूँढते हो जो ज़िंदगी तुम वो ज़िंदगी अब कहीं नहीं है|

जावेद अख़्तर

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