
आज प्रस्तुत है एक कविता, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-
साथ लेकर मैं कभी
जिनको चला था,
रास्ते में वे हवाएं
खो गई हैं।
वे सुकोमल भाव के
स्वप्निल बिछौने
कूदते वे सृजन के
मदमस्त छौने,
सफलता की राह पर
आगे बढे़ तब
सिरफिरी परिकल्पनाएं
खो गई हैं।
पेट की खातिर यहाँ
जीवन जिए हैं
लालसा में सोम की
विष ही पिए हैं,
लोग सारे भीड़ में
रोबोट लगते
वे सहज जीवंतताएं
खो गई हैं।
यंत्रवत सब काम
होते जा रहे हैं
आत्मिक संतोष
खोते जा रहे हैं,
कहाँ वह बेफिक्र सा
अंदाज़ अपना
अपरिमित संभावनाएं
खो गई हैं।
बालपन मन का
भला कब तक फलेगा
शेष जीवन अब यहाँ
यूं ही चलेगा
स्वप्न मत देखो
जिन्हे वर्जित बताती
अब सभी
स्थापनाएं हो गई हैं।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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