अचानक तुम आ जाओ!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि श्री आलोक धन्वा जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।

आलोक जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री आलोक धन्वा जी की यह कविता-

इतनी रेलें चलती हैं
भारत में
कभी
कहीं से भी आ सकती हो
मेरे पास

कुछ दिन रहना इस घर में
जो उतना ही तुम्हारा भी है
तुम्हें देखने की प्यास है गहरी
तुम्हें सुनने की

कुछ दिन रहना
जैसे तुम गई नहीं कहीं

मेरे पास समय कम
होता जा रहा है
मेरी प्यारी दोस्त

घनी आबादी का देश मेरा
कितनी औरतें लौटती हैं
शाम होते ही
अपने-अपने घर
कई बार सचमुच लगता है
तुम उनमें ही कहीं
आ रही हो
वही दुबली देह
बारीक चारख़ाने की
सूती साड़ी
कन्धे से झूलता
झालर वाला झोला
और पैरों में चप्पलें
मैं कहता जूते पहनो खिलाड़ियों वाले
भाग-दौड़ में भरोसे के लायक

तुम्हें भी अपने काम में
ज़्यादा मन लगेगा
मुझसे फिर एक बार मिलकर
लौटने पर

दुख-सुख तो
आते जाते रहेंगे
सब कुछ पार्थिव है यहाँ
लेकिन मुलाक़ातें नहीं हैं
पार्थिव
इनकी ताज़गी
रहेगी यहीं
हवा में !
इनसे बनती हैं नई जगहें
एक बार और मिलने के बाद भी
एक बार और मिलने की इच्छा
पृथ्वी पर कभी ख़त्म नहीं होगी

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

                            ********  

6 responses to “अचानक तुम आ जाओ!”

  1. कितनी खूबसूरत कविता है! यह इंतज़ार की पुरानी यादों और उस पुनर्मिलन की आशा को व्यक्त करती है जो अपनी ताज़गी कभी नहीं खोती। बहुत ही मार्मिक और गहन।

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी।

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    1. धन्यवाद जी

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  2. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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