अपनी एक नई रचना आज शेयर कर रहा हूँ-

आस पंछी सी
कहाँ के गीत
गाती है,
एक पल में
सब दिशाएं
छान आती है।
कौन सा आंगन
सखा है
कौन शत्रु गली,
वर्जनाएं
कुछ नहीं ये
मानती पगली,
सभी सीमाएं
तुरंत
फलांग आती है।
ज़िंदगी में राग-रस
पैदा यही करती,
सगुन के अक्षत
सकारे द्वार पर धरती,
अनगिनत आशीष
प्रभु से
मांग लाती है।
आस है तो
ज़िंदगी
आसान लगती है,
अगम लगते लक्ष्य का
संधान लगती है,
यकायक यह
सृजन के
सामान लाती है।
यह दुआ
जीवन हमारा
प्रवहमान रहे
मन नहीं भटके
दिशा का
सतत ध्यान रहे,
आस अपनी
खोज में भी
सान लाती है।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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