आज प्रस्तुत है एक और गीत
आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

क्या कहने निकले थे,
हमने
क्या कह डाला है,
कविता भी तो
बंधु भयंकर
गड़बड़झाला है।
मेरे बस में नहीं
कदपि यह
खुद ही चलती है,
कहीं सरकती, कहीं उछलती
कहीं बिछलती है,
यह कविता की चंचल
बछिया
पीती हाला है।
हाथ जोड़ बोला मैंने
कहना है
सो कह तू,
बस लोगों से
मैं बोलूंगा
सर्जक तो
मैं हूँ
बाकी तेरी मर्जी का
सब खेल
निराला है।
कहता नहीं सत्य
है जी यह
शब्द पिरोता हूँ
सचमुच अपनी
कविता का मैं
पहला श्रोता हूँ,
विस्मय होता
इसने खुद को
कैसे ढाला है।
कविकुल में
कब से
ऐसा ही
चलता आया है
जो भी मन में आया
वह ही
कविता ने गाया है,
इसे सूर, तुलसी ने
थपकी देकर
पाला है।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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