एक बार फिर से आज मैं, श्रेष्ठ नवगीतकार श्री अनूप अशेष जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ।
अनूप जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अनूप अशेष जी का यह नवगीत-

इतने बरसों बाद भले से
लगते गीले घर।।
गौरैया के पंख भीग कर
निकले पानी से,
कितने गए अषाढ़
देह के
छप्पर-छानी से।
बिटिया के मन में उगते
चिड़ियों के पीले-पर।।
अबके हरे-बाँस फूटें
आँगन शहनाई में,
कितने छूँछे
हर बसंत
बीते परछाई में।
अंकुराई है धान खेत के
सूखे-डीले पर।।
लाज लगे कोई देखे तो
फूटे पीकों-सी,
दूध-भरी
फूटी दोहनी के
खुलते छींकों-सी।
माँ की आँखों में झाँके-दिन
बंधन ढीले कर।।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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