
ये जो शीर्षक दिया है मैंने वो अपने आप में एक गाली माना जाता है।
पिछले दिनों बहुत जगह से ऐसी शिकायतें आई थीं कि आवारा कुत्तों ने किसी को काट लिया, जिनमें पर्यटक भी शामिल थे, कुछ मामलों में तो लोगों की मौत भी हो गई, जिसका कारण था कि कुत्तों के किसी झुंड ने किसी बच्चे अथवा वयस्क पर हमला कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले यह फैसला दिया था कि आवारा कुत्तों को पकड़कर डॉग शेल्टर में रखा जाए। कुत्तों की नसबंदी करने के अभियान तो बहुत सी सरकारों और नगरपालिकाओं द्वारा बरसों से चलाए जाते हैं परंतु उसका परिणाम शायद यही होता है कि इनकी संख्या बढ़ती ही जाती है।
हम लोग बचपन से अपनी गली में एक या दो कुत्तों को देखते रहे हैं, सामान्यतः एक ही कुत्ता होता था एक गली में, जिसको सब लोग प्यार-दुलार करते थे और वह, वहाँ का एक सदस्य और रक्षक भी बन जाता था। एक कहावत भी है कि अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है।
एच. जी. वेल्स का लिखा एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक पृष्ठभूमि का उपन्यास था ‘द आइलंड ऑफ डॉक्टर मॉरियू’, इस उपन्यास में लेखक बताता है कि किस प्रकार एक वैज्ञानिक विभिन्न जंगली पशुओं का ऑपरेशन करता है, उनको प्रशिक्षित करता है, एक द्वीप पर रखता है और इंसानों की तरह चलना-फिरना, व्यवहार करना सिखाता है और वह इस प्रयास में बहुत हद तक सफल भी हो जाता है, लेकिन जैसे-जैसे उनकी संख्या बढ़ती जाती है, उनमें मूल पशु प्रवृत्ति वापस लौटने लगती है और अंत में उस डॉक्टर को अपनी जान बचाकर वापस लौटना पडता है।
एक चुटकुला जो अभी पढ़ा था, याद आ गया। गली में कोई नया कुत्ता आया वह सुंदर भी था और उसके रंग-ढंग बाकी से कुछ अलग थे, उसने बताया कि वो लंदन से आया है। बाकी कुत्तों ने पूछा कि वहाँ तो ज्यादा अच्छी हालत होगी फिर यहाँ क्यों आ गया। वो बोला कि बाकी सब तो वहाँ ठीक है लेकिन भौंकने की जितनी आजादी भारत में है, उतनी कहीं नहीं है।
मैं ऐसा मानता हूँ कि पशु-प्रेम बहुत अच्छी बात है, मैं भी पशु प्रेमी रहा हूँ, लेकिन जब हालत ऐसी हो जाए सार्वजनिक जगहों पर, जैसे कि गोवा में ‘बीच’ के पास बाकायदा कुत्तों के झुंड बैठे रहें और कभी भी किसी पर हमला कर सकते हों, तब पशु प्रेमी होने से काम नहीं चलता।
मुझे एक घटना याद आ रही है कि जब कोई विदेशी विशिष्ट अतिथि राष्ट्रपति भवन में आया हुआ था, उस समय वहाँ एक कुत्ता आ गया था। दिल्ली में रहते हुए मैंने ऐसी घटनाओं के बारे में भी सुना है कि बंदर लोगों के हाथ से रोटी छीनकर भाग जाते हैं। बहुत सी जगह तो किसी चौराहे पर गाय या कहीं कुत्ते भी सड़क घेरकर पंचायत करते हैं। तब लगता है कि पशु-प्रेम हम पर भारी पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट भी लगता है कि राजनेताओं की तरह दबाव में आने लगा है, और अब उसने आदेश दिया है कि शेल्टर में ले जाए गए कुत्ते वापस छोडे जाएं यदि वे बीमार अथवा हिंसक नहीं हैं। अब ये हिंसक होने की पहचान कैसे होगी जी, अक्सर समूह में होना भी पशुओं को, यहाँ तक कि इंसानों को भी हिंसक बना देता है।
हिंसक होने के मामले में क्या इस बात का इंतज़ार करना होगा कि पहले वे किसी पर आक्रमण करें, भले ही किसी की जान भी चली जाए, उसके बाद यह फैसला किया जाए कि वह हिंसक है और ऐसे में हमारी सरकारें कितनी जल्दी कार्रवाई करती हैं, ये तो हम जानते ही हैं।
मुझे तो लगता कि एनिमल शेल्टर में रखने का फैसला ही सही था, मुहल्ले में एक या दो कुत्तों को, वहाँ के निवासियों की सहमति से रहने दिया जा सकता है। सार्वजनिक स्थानों पर पशुओं का झुंड बनने की स्थिति में हमेशा खतरा बना रहेगा। लोग डॉग शेल्टर में जाकर भी इनकी की सेवा कर सकते हैं, जैसा गौशालाओं में भी लोग करते हैं।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार
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