
फिर एक बार
याद आया शाहदरा।
दिल्ली का यह यमुना-पार,
हम थे जब यहाँ
तब एक ही पुल था
यमुना पर
अंग्रेजों के ज़माने का,
अब उम्र है उसकी
सौ वर्ष से अधिक,
नीचे कार-बस, ऊपर रेल।
हमारे समय में अकेला था
यह पुल
चींटियों की तरह
रेंगती थीं बसें इसमें,
बात है 1950 से 80 तक की।
शाहदरा, भोला नाथ नगर
बाबूराम स्कूल
आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय
बाद में आदर्श हट गया नाम से
जब एक विद्यार्थी ने
शिक्षक की हत्या कर दी
नकल करने से रोकने पर।
यमुना पार को
मुख्य दिल्ली से जोड़ता था
एकमात्र यमुना पुल उस समय
और इस पुल को पार करने में
घंटों लग जाते थे तब
ट्रैफिक के कारण,
अब तो कई पुल हैं
यमुना पर
और मैट्रो भी है
जिसका सपना भी
उस समय नहीं था,
यमुना-पार
अब उतना ‘यमुना-पार’
नहीं है।
यहीं रहा मैं
30 वर्ष की आयु तक
1980 तक
और उसके बाद
सेवाकाल में-
जयपुर, झारखंड,
खेतडी, जिला सीधी- मध्य प्रदेश,
मुंबई, लखनऊ आदि-
और गुड़गांव, ग़ोवा
सेवाकाल के बाद।
बस ऐसे ही याद आया
शाहदरा- यमुना पार
जो अब
उतना यमुना पार
नहीं है,
और यमुना पर बना
वह पुराना पुल
आज भी मजबूती से खड़ा है,
जिस पर ऊपर ट्रेन
और नीचे बस, कार आदि
चलते हैं।
हर बार कविता लिखना ही
ज़रूरी नहीं है जी,
इसे मान लीजिए एक स्मृति-रेखा
जीवन के एक महत्वपूर्ण भाग की,
जिसमें शामिल थीं
कवि गोष्ठियां
दिल्ली पब्लिक लायब्रेरी
कवि मित्र
प्रारंभिक नौकरियां-
पीतांबर बुक डिपो,
दिल्ली प्रेस- सरित-मुक्ता,
उद्योग भवन
संसदीय राजभाषा समिति,
और उसके बाद फिर
1980 में
आकाशवाणी, जयपुर
के लिए
प्रस्थान।
कथा संपन्न।
श्रवण-पठन के लिए
धन्यवाद।
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