एक और गीत!

आज प्रस्तुत है मेरी एक नई रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-


तुमने चाहा था देखोगे
मेरी रचनाओं की दुनिया,
रुको द्वार पर सजा रहा हूँ
पीड़ाओं की जगमग लड़ियां|


भीतर की दुनिया
इतनी रंगीन नहीं,
वश में रखना तुम
अपने कौतूहल को,
पाषाणों के बीच
पटकना पड़ता है
मन के कोमल भावों
की इस मखमल को,


हतप्रभ मत होना
जब भीतर देखो तुम
जलती-बुझती आशाओं की
ये फुलझड़ियां।

रचना का संसार
सजाकर रखते हैं
जैसे विक्रेता सभी
सजाते हैं,
देख-परखकर ही
अपना निर्णय लेना
यदि इनमें उत्पाद
तुम्हे कुछ
भाते हैं।


विक्रेता मैं नहीं
भले ले जाना सब
भा जाएं तुमको यदि
पीड़ा की किन्नरियां।


रचना, पकना
मन के इन संवेगों का
मीठे, खारे, कडुवे
जैसे भी ये हों
चलता ही रहता
यह पलता भीतर है
कविताओं में
व्यक्त भले ही
कभी न हो।


जितना कुछ स्वरूप
कविता ने धारा है
सबके लिए सुलभ है
ये मेरी दुनिया।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “एक और गीत!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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