रे समुंदर, ओ समुंदर!

प्रस्तुत है आज की रचना, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

एक अलग दुनिया है अंदर,
रे समुंदर, ओ समुंदर।


कैसे इतने शांत बने हो,
भीतर पाले हुए बवंडर।


तुमसे पार न पाया कोई
हो वह पोरस, भले सिकंदर।


नैया पार लगे नाविक की
यदि न धरो तुम रूप भयंकर।


मछली सभी भांति की पाले
रंग-बिरंगी, सुघढ़-मनोहर।

कितना व्यापक रूप तुम्हारा
तट पर बसे देश-देशांतर।


खोज सभ्यताओं की तुमसे
तुमसे ही आए हमलावर।

मोती, मूंगा भरे गोद में,
सच्चे धनी तुम्ही हो प्रियवर।

कितने सारे नाम तुम्हारे
जलधि, नदीश, सिंधु, रत्नाकर।


यूं विशाल जलयान तैरते
जैसे चलें जीव धरती पर।

रहो शांत है यही प्रार्थना
ताकि रहे जीवन धरती पर।


आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।


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3 responses to “रे समुंदर, ओ समुंदर!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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