आज प्रस्तुत है एक गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

बहुत शिकारी घूम रहे हैं,
बचकर उड़ जा,
प्यारी चिड़िया।
बहुत अटपटा ये मौसम है
हर कोई खुद में ही गुम है
स्वार्थ सभी के ऊपर भारी
हत्या तक की है तैयारी
किस पर यहाँ भरोसा तुझको
सबके हाथ दुधारी,
चिड़िया।
झूठा रिश्ता लोग दिखाते
झट से अनजाने बन जाते,
जहाँ लाभ का अवसर मिलता
मिलकर गीत उसी के गाते,
कहाँ भटककर आई हो, यह
मंज़िल नहीं
तुम्हारी चिड़िया।
दाना खूब डालते हैं ये
मन में वैर पालते हैं ये
अवसर की तलाश बस इनको
मतलब भर निकालते हैं ये,
नहीं किसी के सगे यहां सब
एक दूजे पर
भारी चिड़िया।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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