एक पत्ता गलत उठाया था!

आज प्रस्तुत है एक और गीत
आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

आज तक ये मलाल कायम है,
एक पत्ता गलत उठाया था।

कब समझ साथ सदा देती है
लोभ भी काम किया करता है,
आदमी बुद्धिमान कितना हो,
भूल तो सुबह-शाम करता है

देर तक सालती हैं वे भूलें
खुद को जिनसे न रोक पाया था।

जिस तरह बीज फला करते हैं
कर्म की भी फसल तो होती है
अपनी नादानियों को करके याद
आत्मा तक कभी तो रोती है,

नहीं उतनी महान ये दुनिया
जैसा मैंने कभी मनाया था।

दें मिटा ज़ेहन से वो तस्वीरें
जो भी सोचे बिना बनाई थीं
भावनाएं भले ही अपनी थीं,
किंतु परिणति सदा पराई थी,

देर तक पांव में रहा गड़ता
यक-ब-यक जो कदम उठाया था।

गीत हम यूं ही गुनगुनाते रहें
ये अगर हो तो बहुत सुंदर है,
किंतु ऐसा नहीं होता प्यारे
हर कदम रोकता बवंडर है,

अब तो इतनी भी याद साथ नहीं
कारवां कहाँ तलक आया था।

ज़िंदगी खेल एक चौसर का
लोग ऐसा हमें बताते हैं,
चाल चलनी जिन्हें नहीं आती
हर कदम पर वो मात खाते हैं।

मैंने समझा नहीं यही सब कुछ
पर मुझे खेल खूब भाया था।

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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2 responses to “एक पत्ता गलत उठाया था!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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