आज प्रस्तुत है एक गीत, आप सुधीजनों की सम्मति चाहूंगा-

कितना पानी भरकर बैठे
ये काले बादल
जब भी जी चाहे उसको
ढरकाते रहते हैं।
जब हम घर में रहें
चैन से फिरते रहते हैं
जब बाहर निकलें
तब ये हमको धमकाते हैं।
जब देखो ये अपनी
अकड़ दिखाते रहते हैं।
ऐसा नहीं कि सबको ये
समान सरसाते हैं
कहीं बाढ़ लाते हैं
और कहीं तरसाते हैं
श्रमिकों की दुर्दिन में
रोजी खाते रहते हैं।
जब खेती पानी मांगे
तब गायब ये रहते
ओलावृष्टि कभी करके
जीना दूभर करते।
सुनते हुए प्रार्थनाएं
बिसराते रहते हैं।
कहीं-कहीं तो ऐसी भी
नौबत आ जाती है,
नावें नदी छोडकर
सड़कों पर आ जाती हैं,
ऊपर से ये खिल्ली
खूब उड़ाते रहते हैं।
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार।
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